पहाड़ों के विकास का नया विजन लेकर आए शैलेश खर्कवाल, ‘नेट जीरो विलेज मॉडल’ से बदलेगी गांवों की तस्वीर

Shailesh Kharkwal | Net Zero Village | Uttarakhand : उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक नई पहल की तैयारी है। चंपावत के खर्कगांव निवासी और आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र जल वैज्ञानिक डॉ. शैलेश खर्कवाल अपने तकनीकी अनुभव का इस्तेमाल अब अपने प्रदेश के विकास में करना चाहते हैं। उनका लक्ष्य जल संरक्षण, सौर ऊर्जा और जैविक खेती को एक साथ जोड़कर ऐसे गांव तैयार करना है…जो ऊर्जा और संसाधनों के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर बन सकें।

डॉ. खर्कवाल के स्टार्टअप ‘एन्वायरनसेंस’ ने पानी में मौजूद भारी धातुओं और विषैले तत्वों की रियल टाइम निगरानी करने वाली सेंसर तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के जरिए पानी की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखी जा सकती है। वहीं उनका एक अन्य स्टार्टअप ‘एच-20 मंत्रा’ स्वच्छ पेयजल, जल शोधन और पानी के दोबारा इस्तेमाल पर काम कर रहा है।

डॉ. शैलेश खर्कवाल ने हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से वर्चुअल बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपनी अंतरराष्ट्रीय तकनीकी विशेषज्ञता को उत्तराखंड के गांवों के विकास से जोड़ने की इच्छा जताई। मुख्यमंत्री ने इस अभियान की शुरुआत चंपावत के खर्कगांव से करने का आग्रह किया है।

डॉ. खर्कवाल उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ‘नेट जीरो विलेज’ मॉडल विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इस योजना का उद्देश्य गांवों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना और बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम करना है।

क्या है नेट जीरो विलेज मॉडल?

इस मॉडल में जल संरक्षण, सौर ऊर्जा और जैविक खेती को एक साथ जोड़ा जाएगा। इसके तहत घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाए जाएंगे। वहीं घरों की रसोई और बाथरूम से निकलने वाले गंदे पानी को प्राकृतिक फिल्टर प्रणाली से साफ कर सिंचाई और बागवानी में इस्तेमाल करने की योजना है।

इसके अलावा उत्तराखंड के पारंपरिक जलस्रोतों यानी नौले, धारे और चाल-खाल को वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवित करने पर भी जोर दिया जाएगा। इससे गांवों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने और वर्षा जल को संरक्षित करने में मदद मिल सकती है।

खेती के साथ पैदा होगी सौर ऊर्जा

इस मॉडल की एक खास तकनीक एग्रीवोल्टाइक्स है। इसमें एक ही जमीन पर खेती करने के साथ सौर ऊर्जा का उत्पादन भी किया जा सकता है। इससे किसानों को खेती के साथ बिजली उत्पादन का विकल्प मिलेगा।

इसके अलावा सौर ऊर्जा से चलने वाली पंपिंग प्रणाली के जरिए दूरदराज के जलस्रोतों से पानी को ऊंचाई पर बने टैंकों तक पहुंचाने की योजना है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।

पांच देशों में काम कर रही हैं कंपनियां

डॉ. खर्कवाल के नेतृत्व में उनकी कंपनियां भारत सहित पांच देशों में वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट और वाटर रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं। उनकी विकसित तकनीकों का उद्देश्य गंदे पानी को साफ करके दोबारा उपयोग लायक बनाना है।

एच-20 मंत्रा की कम लागत वाली स्वदेशी तकनीक के जरिए फैक्ट्रियों, सोसायटियों और गांवों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ कर खेती, बागवानी और औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल करने पर काम किया जा रहा है।

डॉ. खर्कवाल की यह पहल उत्तराखंड के उन पहाड़ी गांवों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है…जहां पानी, ऊर्जा और खेती से जुड़ी चुनौतियां लंबे समय से बनी हुई हैं। हालांकि इस मॉडल की वास्तविक सफलता इसके धरातल पर लागू होने और स्थानीय लोगों की भागीदारी पर निर्भर करेगी।

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