Nanda Devi Yatra | Chamoli News | Uttarakhand Religion : चमोली में हिमालय महाकुंभ के रूप में प्रसिद्ध मां नंदा की बड़ी जात यात्रा शनिवार, 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हो गई। मां नंदा की डोली के रवाना होते ही पूरा कुरुड़ क्षेत्र जय मां नंदा के जयकारों से गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी डोली के साथ यात्रा में शामिल हुए।
सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा राजराजेश्वरी की पांच दिन तक पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए गए। इसके बाद विधि-विधान के साथ मां की डोली को कैलाश के लिए विदा किया गया। विदाई के दौरान माहौल भावुक हो गया और कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। भक्तों ने डोली के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और यात्रा के सफल होने की कामना की।
करीब 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा
मां नंदा देवी की यह यात्रा करीब 280 किलोमीटर लंबी बताई जाती है। सामान्य लोकजात यात्रा में मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से होते हुए वेदनी कुंड तक पहुंचती है। इस बार बड़ी जात यात्रा के दौरान डोली को आगे होमकुंड तक ले जाने की तैयारी है।
कुरुड़ से रवाना होने के बाद डोली निर्धारित पड़ावों से होते हुए हिमालयी क्षेत्र की ओर बढ़ेगी। रास्ते में ग्रामीण श्रद्धालुओं की ओर से डोली का स्वागत किया जाएगा और पूजा-अर्चना की जाएगी। यात्रा के अंतिम चरण में डोली होमकुंड पहुंचेगी…जहां धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।
30 सितंबर को होमकुंड में समापन
बड़ी जात यात्रा का मुख्य धार्मिक अनुष्ठान 30 सितंबर को होमकुंड में प्रस्तावित है। यहां मां नंदा की डोली की पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद यात्रा का समापन होगा।
नंदा देवी की लोकजात यात्रा को लेकर हर वर्ष बसंत पंचमी के अवसर पर तिथि निर्धारित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां नंदा अपने मायके से ससुराल कैलाश की ओर प्रस्थान करती हैं। बड़ी जात इसी परंपरा का विशेष और विस्तृत रूप मानी जाती है।
बधाण क्षेत्र की डोली को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं
बड़ी जात मंदिर समिति के अध्यक्ष कर्नल हरेंद्र सिंह रावत के अनुसार इस बार बधाण क्षेत्र की नंदा की डोली बड़ी जात में शामिल नहीं होगी। हालांकि, डोली के शामिल नहीं होने की वजह को लेकर अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं।
उन्होंने कहा कि इस मामले में जिलाधिकारी चमोली से भी बातचीत की जाएगी…ताकि डोली के यात्रा में शामिल न होने की वास्तविक वजह स्पष्ट हो सके।
इस साल बड़ी जात, 2027 में राजजात
इस वर्ष कुरुड़ मंदिर समिति की ओर से बड़ी जात यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। समिति के अनुसार 12 साल का समय चक्र पूरा होने के कारण 5 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक यात्रा आयोजित करने का निर्णय लिया गया है।
वहीं, मुख्य नंदा देवी राजजात यात्रा अब 2027 में आयोजित की जाएगी। नौटी राजजात समिति और प्रशासन ने यात्रा को 2027 तक टालने का फैसला किया है।
नौटी समिति और प्रशासन की ओर से यात्रा स्थगित करने के पीछे मलमास के साथ-साथ मौसम और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों को भी वजह बताया गया है। समिति के अनुसार सितंबर के दूसरे पखवाड़े में ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी, ओलावृष्टि और बारिश का खतरा रहता है। इसके अलावा होमकुंड सहित ऊंचाई वाले इलाकों में यात्रियों के लिए जरूरी सुविधाओं का काम भी पूरी तरह तैयार नहीं था।
यात्रा के रूट को लेकर सामने आया विवाद
2026 की राजजात यात्रा की तैयारियां नौटी की आयोजन समिति की ओर से की जा रही थीं। प्रस्तावित रूट में यात्रा की शुरुआत नौटी से और शुरुआती पड़ाव ईड़ाबधाणी रखा गया था।
कुरुड़ पक्ष ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई। उसका कहना है कि नंदा यात्रा की परंपरा में कुरुड़ का महत्वपूर्ण स्थान रहा है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कुरुड़ से जुड़े लोगों ने देहरादून स्थित पर्यटन विभाग के कार्यालय पहुंचकर प्रस्तावित रूट में कुरुड़ को शामिल करने की मांग भी उठाई थी। उनका दावा है कि इस यात्रा की पुरानी परंपरा में इसे ‘बड़ी जात’ के नाम से जाना जाता रहा है।
कुरुड़ पक्ष ने उठाए परंपरा से जुड़े सवाल
कुरुड़ पक्ष का कहना है कि समय के साथ नंदा यात्रा के आयोजन में कांसुआ के कुंवर और नौटी गांव के लोगों की भूमिका बढ़ती गई…जबकि कुरुड़ की भूमिका कम होती गई।
कुरुड़ पक्ष के अनुसार धार्मिक और पारंपरिक दृष्टि से यात्रा में कुरुड़ का स्थान महत्वपूर्ण है। इसी वजह से 2026 की राजजात को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आए।
हर बार ठीक 12 साल बाद नहीं हुई राजजात
नंदा देवी राजजात यात्रा को आम तौर पर 12 साल के चक्र से जोड़ा जाता है, लेकिन इतिहास में यात्रा हर बार ठीक 12 साल बाद ही हुई हो…ऐसा नहीं रहा है।
1968 के बाद 1987 में यात्रा हुई। इसके बाद 2000 में आयोजन हुआ। वर्ष 2012 में यात्रा प्रस्तावित थी, लेकिन 2013 की आपदा के कारण इसे आगे बढ़ाना पड़ा और बाद में 2014 में यात्रा आयोजित हुई।
इसी पुराने क्रम को देखते हुए 2026 में राजजात यात्रा को लेकर चर्चा और विवाद शुरू हुआ। नौटी पक्ष ने मौसम और तैयारियों को देखते हुए यात्रा 2027 में कराने का निर्णय लिया, जबकि कुरुड़ पक्ष ने 2026 में ही बड़ी जात यात्रा निकालने का फैसला किया।
इस बार क्यों हो रही हैं दो यात्राओं की चर्चा?
2026 में दो अलग यात्राओं की स्थिति बनने के पीछे मुख्य वजह नौटी आयोजन समिति और कुरुड़ पक्ष के बीच सामने आए मतभेद हैं।
नौटी आयोजन समिति राजजात की तैयारी कर रही थी, लेकिन बाद में मलमास, मौसम और यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ी परिस्थितियों का हवाला देते हुए यात्रा को 2027 तक स्थगित कर दिया गया।
दूसरी ओर कुरुड़ पक्ष ने यात्रा के प्रस्तावित शुरुआती पड़ाव और अपनी पारंपरिक भूमिका को लेकर आपत्ति जताई। कुरुड़ पक्ष का कहना है कि यात्रा में उसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
नौटी समिति की राजजात स्थगित होने के बाद कुरुड़ मंदिर समिति ने अपनी परंपरा के अनुसार 2026 में बड़ी जात यात्रा आयोजित करने का निर्णय लिया। इसी के तहत 5 सितंबर को मां नंदा की डोली कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हो गई।











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