लकवा, पार्किंसन और कमर की गंभीर बीमारी में कैसे मददगार है फिजियोथेरेपी? डॉ. दीपक मेर ने बताया

Physiotherapy | Paralysis | Parkinson Disease : Haldwani : बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी और बढ़ती उम्र के साथ कई तरह की शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं सामने आ रही हैं। पैरालिसिस, एंकायलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस और पार्किंसन ऐसी बीमारियां हैं….जो व्यक्ति की चलने-फिरने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच, सही इलाज और नियमित फिजियोथेरेपी से मरीजों की कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।

फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. दीपक मेर ने कहा कि इन तीनों बीमारियों की प्रकृति अलग है और इनका इलाज भी अलग-अलग होता है। हालांकि मरीज की स्थिति के हिसाब से फिजियोथेरेपी काफी मददगार साबित हो सकती है।

पैरालिसिस यानी लकवा कई बार स्ट्रोक के कारण होता है। इसमें शरीर के एक हिस्से में अचानक कमजोरी, सुन्नपन, चेहरा टेढ़ा होना या बोलने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे लक्षण सामने आने पर मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। शुरुआती समय में इलाज बेहद महत्वपूर्ण होता है।

मरीज की स्थिति स्थिर होने के बाद फिजियोथेरेपी के जरिए हाथ-पैरों की गति, मांसपेशियों की ताकत, संतुलन और चलने-फिरने का अभ्यास कराया जाता है।

एंकायलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस एक लंबे समय तक रहने वाली सूजन संबंधी बीमारी है…जो रीढ़ और जोड़ों को प्रभावित करती है। इसमें खासतौर पर सुबह उठने पर कमर में जकड़न और दर्द महसूस हो सकता है। नियमित व्यायाम, सही पोश्चर और विशेषज्ञ की सलाह से की गई फिजियोथेरेपी रीढ़ की गति बनाए रखने में मदद कर सकती है।

पार्किंसन रोग में हाथ-पैरों में कंपकंपी, शरीर में अकड़न, चलने की गति धीमी होना और संतुलन बिगड़ना जैसे लक्षण हो सकते हैं। फिजियोथेरेपी में मरीज को चलने, संतुलन बनाने, मांसपेशियों को मजबूत करने और रोजमर्रा के काम करने का अभ्यास कराया जाता है।

डॉ. दीपक मेर का कहना है कि इन बीमारियों में मरीज की जरूरत के मुताबिक उपचार और व्यायाम तय करना जरूरी है। बिना विशेषज्ञ की सलाह के कठिन व्यायाम या किसी भी तरह की थेरेपी शुरू नहीं करनी चाहिए। अचानक चेहरे का झुकना, हाथ-पैर में कमजोरी या बोलने में परेशानी होने पर तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

उन्होंने लोगों से अपील की कि शरीर में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज न करें। समय पर जांच, उचित इलाज, नियमित व्यायाम और परिवार का सहयोग मरीज को बेहतर और आत्मनिर्भर जीवन जीने में मदद कर सकता है।

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